Tuesday, 16 September 2014

चारण " :-

मैं जब भी कुछ कहने, मुँह को खोलूंगा ।
अंगारों की भाषा मेरी और आग में बोलूंगा।
सच कहने की परम्परा का वाहक हूँ।
चारण हूँ, चारण बन कर सच तोलूंगा।।
मैंने जब भी मुँह खोला है, जिन
फर्जी इतिहासों पर।
सच को सच ही कहता हूँ मैं, खड़ा झूठ
की लाशों पर।
मन में है विश्वास सत्य का, और
भरोसा सांसों पर।
कृपा नहीं दिखाई मैंने, खुद पर, खुद के
खासों पर।।
पट्टी घिसना किसी की मेरी आदत में शुमार
नहीं।
मृदु सामने पीछे चुगली ये मेरा व्यवहार नहीं।
कोई कहे बुरा भी लेकिन मैं कोई लाचार नहीं।
चारण सच ना बोले जो उसमे चारणाचार नहीं।।
युगबोधी चारण की अजब कहानी है।
कहीं है शोणित धार कहीं ये ठंडा पानी है।
बलिदानी धारा है मेरी, मुझमे ओज रवानी है।
स्वामिभक्ति और देशभक्ति ये भक्ति मैंने
जानी है।।
आवड़, करणी, इंदर ये माताएँ कुल के गौरव
की।
जो जन्मा चारणबंस यातना नहीं भोगता रौरव
की।
गंध फैली है इस कुल में सदा ही शक्ति-सौरभ
की।
मैं भी जन्मा उसी वंश, ये है बात मेरे गौरव
की।।
लंक जली तो हनुमत को भी धीरज
बंधा दिया मैंने।
धर्मराज को कौरवकुल युवराज बना दिया मैंने।
बप्पा रावल को चितौड़ी गढ़ और राज
दिया मैंने।
राष्ट्रहित में खुद को ही हरदम बलिदान
किया मैंने।।
आज जरूरत पुनः देश को, फिर से सत्य
को बोलूंगा।
जब भी मुँह को खोलूंगा, तो अंगारों में बोलूंगा।।
जब भी मुँह को खोलूंगा, तो अंगारों में बोलूंगा।।